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वीरता• स्वाभिमान•राष्ट्रभक्ति का प्रतिक महाराजा सूरजमल (जाट) उत्तर भारत के महान शासक, रणनीतिकार और राष्ट्रनिर्माता (इतिहास, संघर्ष, प्रशासन और विरासत का प्रामाणिक अध्ययन)

वीरता• स्वाभिमान•राष्ट्रभक्ति का प्रतिक महाराजा सूरजमल (जाट) उत्तर भारत के महान शासक, रणनीतिकार और राष्ट्रनिर्माता (इतिहास, संघर्ष, प्रशासन और विरासत का प्रामाणिक अध्ययन)

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Genre: Story Book

Language: Hindi

Pages: 57

Binding: Paperback

Book size: Lenth 8.5 inch / Width: 5.5 inch / height: 0.145 inch

ISBN: 978-93-89785-14-2

Item Weight: 99 Grams

Author: Divashni Gandas

Product: Description

पुस्तक परिचय
यह पुस्तक "महाराजा सूरजमल (जाट)" 18वीं शताब्दी के उत्तर भारत के महान शासक, रणनीतिज्ञ और राष्ट्रनिर्माता महाराजा
सूरजमल के जीवन, संघर्ष, शासन और ऐतिहासिक विरासत का एक तथ्यपरक, संतुलित और शोध-आधारित अध्ययन प्रस्तुत करती
है। यह कृति उन्हें केवल एक वीर योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक, दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ और स्थायी राज्य-निर्माता के
रूप में स्थापित करती है।
पुस्तक में मुऱाल साम्राज्य के पतन, क्षेत्रीय शक्तियों के उदय, जाट राज्य की स्थापना, भरतपुर और लोहागढ़ जैसे दुर्गों की रणनीतिक
भूमिका तथा सूरजमल की युद्ध-नीति और कूटनीति का विश्लेषणात्मक विवरण दिया गया है। सरल हिंदी भाषा में लिखी गई यह कृति
छात्रों, शोधार्थियों और सामान्य पाठकों-सभी के लिए 18वीं सदी की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों को स्पष्ट और समझने योग्य
बनाती है।

लेखक परिचय
Divashni Gandas एक शोध-अनुरागी लेखिका, इतिहासकार और शिक्षिका हैं। उनकी विशेषज्ञता भारतीय इतिहास, अंतरराष्ट्रीय
संबंध (International Relations), जर्मन भाषा शिक्षण तथा सामाजिक-राजनीतिक अध्ययन के क्षेत्र में है। उन्होंने इतिहास को
केवल घटनाओं की श्रृंखला के रूप में नहीं, बल्कि उसके सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक प्रभावों के माध्यम से समझने और प्रस्तुत
करने पर विशेष बल दिया है।
Divashni Gandas को उत्तर भारत के ऐतिहासिक व्यक्तित्वों, विशेष रूप से महाराजा सूरजमल जैसे राष्ट्रनायकों के जीवन, संघर्ष
और शासन व्यवस्था पर शोध में गहरी रुचि है। उनका उद्देश्य इतिहास को भावनात्मक या विवादात्मक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि प्रमाण,
संदर्भ और संतुलित विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करना है।
यह पुस्तक महाराजा सूरजमल के जीवन, प्रशासनिक दूरदर्शिता और राष्ट्रहित में दिए गए योगदान को सरल, तथ्यात्मक और
समकालीन पाठकों के लिए सुलभ भाषा में प्रस्तुत करती है। लेखिका का प्रयास है कि पाठक 18वीं शताब्दी के उत्तर भारत की जटिल
राजनीतिक परिस्थितियों को एक व्यापक और निष्पक्ष दृष्टिकोण से समझ सकें।
शिक्षा और अनुसंधान को साथ लेकर चलने वाली Divashni Gandas का मानना है कि इतिहास केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान
और भविष्य को दिशा देने वाला ज्ञान है।

सह-लेखक परिचय
Avishesh Pradhan इस पुस्तक के सह-लेखक हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंध, सुरक्षा अध्ययन तथा जर्मन भाषा के क्षेत्र में सक्रिय
शोधकर्ता हैं। उन्होंने Amity University, Noida से एम.ए. (International Relations) तथा जर्मन भाषा में स्नातक (BA
Hons.) की डिग्री प्राप्त की है। उनकी अकादमिक रुचि वैश्चिक राजनीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भू-राजनीतिक प्रभाव, और बदलती
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अध्ययन में रही है।
उन्होंने Defence Research and Pragya Centre for Research (DRAS) और Centre for Comprehensive
Security Studies (CCSS) जैसे संस्थानों के साथ कार्य करते हुए शोध रिपोर्टें तैयार की हैं तथा कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय
सम्मेलनों में अपने शोध प्रस्तुत किए हैं। Avishesh Pradhan के अनेक शोध-लेख प्रतिष्ठित जर्नलों और मंचों पर प्रकाशित हो चुके
हैं।
इस पुस्तक में सह-लेखक के रूप में उनका योगदान इसके विश्लेषणात्मक ढांचे, ऐतिहासिक संदर्भों और शोध-आधारित दृष्टिकोण को
सुदृढ़ करता है, जिससे यह कृति अधिक प्रमाणिक, संतुलित और अकादमिक रूप से विश्वसनीय बनती है।

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