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तीन नाटक: तीन आयाम (नाट्य संग्रह)
तीन नाटक: तीन आयाम (नाट्य संग्रह)
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Genre: Story Book
Language: Hindi
Pages:85
Binding: Paperback
Book size: Lenth 8.5 inch / Width: 5.5 inch / height: 0.213 inch
ISBN: 978-93-89785-39-5
Item Weight: 130 Grams
Author: वीणा सहाय
Product: Description
प्रवेशक की प्रस्थानत्रयी
भरत नाट्यशास्त्र में नाट्य प्रस्थान का दायित्व प्रवेशक को दिया गया है। इसकी संस्कृत शब्दावली में दो शब्द आते हैं अर्थोपक्षेपक और विष्कंभक। सरलता के लिए यहां उसे ही प्रवेशक कहा जा रहा। प्रवेशक के बिना मंचस्थ रंगप्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। पिछली शती के अंतिम दशकों से हिंदी नाट्यलेखन की स्वाभाविक प्रक्रिया अवरुद्ध हुई पड़ी है। धर्मवीर भारती, सुरेन्द्र वर्मा, स्वदेश दीपक, के पी सक्सेना, सुशील कुमार सिंह, रमेश बक्षी, अजीत कौर के दौर के बाद नाट्य लेखकों की कोई पीढ़ी नई शती के दो दशक बीत जाने के बाद तक आई ही नहीं। कारण सिर्फ यह है कि रंगकर्मी कहानी का रंगमंच करने लगे। नाट्यालेख की जरूरत इससे पूरी होती गई। या फिर अनुवाद पर वे आश्रित होकर रह गए। कभी बादल सरकार तो कभी विजय तेंदुलकर या गिरीश कर्नाड या फिर चेखोव, इब्सन या कामू। समय को प्रतीक्षा थी किसी प्रवेशक की जो भारतेंदु और प्रसाद से चली आ रही नाट्यालेख परंपरा को आगे बढ़ाए। हिंदी में और मौलिक कथातत्वों में। प्रतीक्षा थी कि प्रस्थान बने। मुझे खुशी है कि इस प्रस्थान में देर से ही सही, लेकिन हिंदी में नाट्यालेख पूरी प्रखरता से सामने आए हैं, बिल्कुल अभी अभी। प्रवेशक हैं वीणा सहाय। वे लंबे अरसे से हिंदी रंगकर्म से जुड़ी हैं। अब वे अपने लिखे नाटक के साथ प्रस्तुत हुई हैं, वह भी एक नहीं बल्कि तीन नाटकों के साथ। इस प्रस्थानत्रयी के लिए उन्हें बधाई तीनों नाटकों को मैं एक साथ पढ़ गया और ध्यान नहीं गया कि इनके शीर्षक क्या हैं। जब ध्यान गया तो लगा लेखिका को न सिर्फ शीर्षक पर पुनर्विचार करना चाहिए बल्कि नाटकसंग्रह का शीर्षक भी आकर्षक बनाना चाहिए। जैसे वीरांगना या हाथ नहीं मिलना जैसे शीर्षक साठ के दशक में लिखे साधारण नाटकों के शीर्षक जैसे लगते हैं। बस, सिवाय इसके, तीनों नाटकों में ऐसा कुछ भी नहीं कि बेहतर बनाने का कोई सुझाव दिया जा सके। ये अपने आप में पूर्ण हैं और आधुनिक भी। इन्हें एकांकी की तरह भी मंचस्थ किया जा सकता है और पूर्णकालिक की तरह भी, क्योंकि हर नाटक में दर्शक को अनुभव पूर्णकालिक मिलेगा। नाटकों की भाषा सरल रखी गई है जो कथानक को दुरूह नहीं बनाते, बल्कि रोचक बने रहने देते हैं। वीरांगना या हाथ नहीं को ड्राइंग रूम प्ले की तरह भी प्रस्तुत किया जा सकता है और विशाल प्रोसेनियम पर भी, और खुले आकाश के नीचे भी। हां, तीसरा नाटक जो नाथ संप्रदाय का परिप्रेक्ष्य लेकर सांप्रतिक परिवेश को प्रकाशित करने की पहल करता है, विशेष उल्लेखनीय है। यह सचमुच एक पहल है। इसमें आध्यात्मिक और राजनीतिक छायाओं को साथ साथ देखना दिलचस्प है। नाटकीय भी।
इन नाटकों के लिए लेखिका को स्वस्ति शुभेच्छा।
डॉ गौतम चटर्जी
नाट्यविद

