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श्रीमद्भगवद्गीता – स्वामी विवेकानंद जी के परिप्रेक्ष्य में : आधुनिक सार्वभौमिक प्रासंगिकता

श्रीमद्भगवद्गीता – स्वामी विवेकानंद जी के परिप्रेक्ष्य में : आधुनिक सार्वभौमिक प्रासंगिकता

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Genre: Spiritual  motivational

Language: Hindi

Pages:142

Binding: Paperback

Book size: Length 9 inch / Width: 6 inch / height: 0.355 inch

ISBN:978-93-89785-17-3 

Item Weight: 215 Grams

Author: डॉ रविन्द्र कुमार गुप्ता, गणेश दत्त बजाज

Product: Description

गीता के समान वेदों का भाष्य कभी नहीं बना है और बनेगा भी नहीं। [खंड 5, पृष्ठ 155] 

गीता तो छोटे के अंदर महान को देखने की शिक्षा देती है, धन्य है ये ग्रंथ। [खंड 8, पृष्ठ 353] 

गीता एक धर्म समन्वय ग्रंथ है, इसमें किसी भी संप्रदाय का अनादर नहीं है।  [खंड 10, पृष्ठ 165]

भगवदगीता वेदांत का सर्वश्रेष्ठ प्रमाणभूत ग्रंथ है। [खंड 7, पृष्ठ 69]

गीता को ही पढ़कर देखो, तुम्हें कृष्ण के जीवन और गीता के एक एक शब्द में सामंजस्य दिखेगा। [खंड 7, पृष्ठ 192]

गीता में भक्ति की बार बार विवेचना ही नहीं की गई है, वरन उनमें भक्ति की अंतर्निष्ठ भावना चरम उत्कृष्ट तक पहुँच गयी है। [खंड 7, पृष्ठ 317] 

गीता में भगवान ने जो कहा है - प्रबल कर्मयोग - हृदय में अमित साहस, अपरिमित शक्ति। तभी तो देश में सब लोग जाग उठेंगे, नहीं तो जिस अंधकार में तुम हो, उसी में वे भी रहेंगे। [खंड 6, पृष्ठ 158]

कृष्णा सदा भगवद गीता के उपदेशों की साकार मूर्ति थे, वे अनासक्ति के उज्ज्वल उदाहरण थे। उन्होंने अपना सिंहासन त्याग दिया और कभी चिंता नहीं की। [खंड 5, पृष्ठ 151]

गीता का कथन है, “कर्मयोग का अर्थ है - कुशलता से” अर्थात वैज्ञानिक प्रणाली से कर्म करना। [खंड 4, पृष्ठ 7]

गीता में भक्ति की राह पर सभी नर-नारियों, सभी जातियों और सभी वर्णों को अधिकार दिया गया है। [खंड 2, पृष्ठ 129]

गीता में सर्वत्र ईश्वर का उपदेश है। [खंड 1, पृष्ठ 302]

 

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